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Tuesday, October 29, 2013

जाऊं कहाँ ?

(डायरी से एक और रचना )

आजमा के देखे लाखों तरीके,
पर बेकरारी दिल की मिटती ही नहीं,
सुकून देने दिल को, जाऊं तो जाऊं कहाँ ?

चारो तरफ तो बस हैं, अपने ही अपने,
अपनों की भीड़ में ही खो गया हूँ शायद,
खुद को ढूंढ लाने, जाऊं तो जाऊं कहाँ ?

जिंदगी ही जब उतरे, बेवफाई पे यारों,
तो और कोई मुझसे वफ़ा क्या करे,
बेवफा जिंदगी को छोड़, जाऊं तो जाऊं कहाँ ?

लकीरें ही हाथ की अपनी नहीं है शायद,
किस्मत भी अब ठोकर लगाये तो क्या,
खोटी किस्मत के साथ, जाऊं तो जाऊं कहाँ ?

आँखों की चमक अब दिखती ही नहीं,
उमंगें भी दिल की कहीं खो गई हैं,
रौशनी की खोज में, जाऊं तो जाऊं कहाँ ?

होठों से मुस्कान कभी गई नहीं मेरी,
पर ख़ुशी भी तो कभी मिली ही नहीं,
गम लेकर दिल में, जाऊं तो जाऊं कहाँ ?

आँखों के आंसू उसके थमते नहीं है,
आंसुओं का ज्यों कोई सैलाब उमड़ा हो,
इस बाढ़ से बचकर, जाऊं तो जाऊं कहाँ ?

30.07.2005 

8 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बुधवार (30-10-2013) त्योहारों का मौसम ( चर्चा - 1401 ) में "मयंक का कोना" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का उपयोग किसी पत्रिका में किया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुन्दर रचना मिटटी को मिटती कर दें ..

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  3. शुभदीपावली,गोवर्धन पूजन एवं यम व्दितीया श्री चित्रगुप्त जी की पूजन की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें स्वीकार करें

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