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Friday, October 19, 2012

जवाब नहीं मिलता

दिल की हस्ती किसी को क्या दिखाएँ "दीप",
गुम हो सकूँ ऐसा कोई मंजर नहीं मिलता;
नदियां तो अक्सर मिल जाती हैं राहों में,
पर डूब सकूँ ऐसा कोई समंदर नहीं मिलता | 

साथ उसके रह सकूँ वो जहां कहाँ ऐ "दीप", 
जला सकूँ खुद को वो शमशान नहीं मिलता; 
इश्क में तेरे डूब जाने को दिल करता तो है, 
पर टूट सकूँ जिसमे वो चट्टान नहीं मिलता | 

तैयार तो खड़े हैं हम यहाँ लुटने को ऐ "दीप", 
पर चुरा सके जो मुझको वो चोर नहीं मिलता; 
बह तो जाऊँ मैं बारिश में तेरे प्यार की मगर, 
बरसात वो कभी मुझको घनघोर नहीं मिलता | 

एक अलग-सी ही दुनिया बसा लूँ संग तेरे मैं, 
साथ तेरे बैठ के देखूँ वो ख्वाब नहीं मिलता; 
प्रश्न तो कितने ही उठते हैं मन में "दीप", 
पर दे सकूँ जो तुझको वो जवाब नहीं मिलता |

5 comments:

  1. सुन्दर रचना प्रदीप भाई

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (20-10-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ! नमस्ते जी!

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  3. प्रश्न तो कितने ही उठते हैं मन में "दीप",
    पर दे सकूँ जो तुझको वो जवाब नहीं मिलता |
    ..दिल की कशमकश में जवाब देना सरल कहाँ ...बहुत खूब

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  4. प्रश्न तो कितने ही उठते हैं मन में "दीप",
    पर दे सकूँ जो तुझको वो जवाब नहीं मिलता |बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

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  5. भावपूर्ण रचना !
    वो कहते हैं ना... 'बिन माँगे मोती मिले.. माँगे मिले न मौत...'
    अक्सर...हम जो माँगते हैं... या तो मिलता नहीं.. या बहुत तपस्या के बाद मिलता है...
    ~सादर

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