मेरे साथी:-

Tuesday, February 15, 2011

मोमबत्ती

एक मोमबत्ती जलती जाती,
जल-जल के कुछ कहती जाती;
ताप में खुद को पिघलाती,
रौशन जहाँ को कर जाती|

एक धागे से संजोग बनाती,
अद्भुत लौ ये दिखलाती;
तूफ़ान से अगर ये लड़ जाती,
जब तक न बुझे लडती जाती|

हर मानव को कुछ सिखलाती,
मानवता का ये पाठ पढ़ाती;
परहित ही सर्वोपरि है,
खुद जलकर सबको बतलाती|

हर कष्ट को खुद ही सह जाती,
औरों का भला करती जाती;
क्षण-क्षण विलुप्त होती जाती,
पर हर पल को दहका जाती|

हर किरणें उसकी समझाती,
लड़ने का बल ये दिलवाती;
अंतर्मन में उल्लास ये भरती,
खुशियों के दरश ये करवाती|

माना की ये गलती जाती,
पर पुनः पुनः जमती जाती;
उठ-उठ कर तुम लड़ते जाओ,
इस जोश को हममे भर जाती|

1 comment:

कृपया अपनी टिप्पणी दें और उचित राय दें | आपके हर एक शब्द के लिए तहेदिल से धन्यवाद |
यहाँ भी पधारें:-"काव्य का संसार"

हिंदी में लिखिए:

संपर्क करें:-->

E-mail Id:
pradip_kumar110@yahoo.com

Mobile number:
09006757417

धन्यवाद ज्ञापन

"मेरा काव्य-पिटारा" ब्लॉग में आयें और मेरी कविताओं को पढ़ें |

आपसे निवेदन है कि जो भी आपकी इच्छा हो आप टिप्पणी के रूप में बतायें |

यह बताएं कि आपको मेरी कवितायेँ कैसी लगी और अगर आपको कोई त्रुटी नजर आती है तो वो भी अवश्य बतायें |

आपकी कोई भी राय मेरे लिए महत्वपूर्ण होगा |

मेरे ब्लॉग पे आने के लिए आपका धन्यवाद |

-प्रदीप