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Tuesday, February 15, 2011

कविता

" जब कवि का उर बिंध जाता है अचूक वेदना के सर से,
तब झर-झर कविता बहती है कवि के अंतर से |"

ये कविता क्या है? मानव ह्रदय का उदगार है,
भावनाओं की अभिव्यक्ति का एक रूप है,
और पूरी श्रृष्टि का इसमें समाहार है|
जब उर में कोई अमिट और करुण वेदना का संचार होप्ता है,
उसमे विचारों और भावनाओं का अम्बार होता है,
तब आँखों से नीर का बहाव और ह्रदय से कविता का उदभव होता है;
सब कुछ सरल अभिव्यक्ति होती है कुछ ना इसमें वैभव होता है|

ह्रदय की कोई बात जब होठों तक आकर अटक जाती है,
कविता बनकर तब वह स्वयं बाहर उमड़ जाती है|
मुख्यतः प्राकृतिक सौंदर्य और भावना ही इसका मुख्य आधार होता है,
पुरे ब्रह्माण्ड में ही कविता का विस्तार होता है|
रवि की किरण की भी जहाँ अक्षमता होती है,
वहां भी पहुचने की इसमें क्षमता होती है|

इसे शब्दों में बांधने की कोशिश एक बहुत बड़ी गुश्ताखी है,
मैं ये कर रहा हूँ पर पहली गलती के लिए माफ़ी है|
कलम-कागज़ से वर्णित करना अगर इतना ही सरल होता,
लाखों तर गए होते और किसी एक को महान कहना विरल होता|
छोड़ रहा हूँ कोशिश इसे वर्णित और अलंकृत करने को शब्द नहीं हैं,
यह स्वयं इतना विस्तृत और लोकचर्चित है की कुछ और कहने की जरुर नहीं है|

3 comments:

  1. इसे शब्दों में बांधने की कोशिश एक बहुत बड़ी गुश्ताखी है,
    मैं ये कर रहा हूँ पर पहली गलती के लिए माफ़ी है|


    Wah kya abhivyakti hai sriman..
    Badhaiyan..

    ReplyDelete
  2. बहुत सुंदर कविता
    shiva12877.blogspot.com

    ReplyDelete

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