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Friday, January 8, 2016

गर मेरी तू होती

फना तेरे मोहब्बत पे मैं भी होता,
नजर भर प्यार से गर देख तू लेती..

ईश्क की आग में जल भी मैं जाता,
मुस्कुरा कर थोड़ा जो निहार तू लेती..

अश्कों के सागर भी बहा मैं देता,
मांग कर दिल गर जो तोड़ तू देती..

जुदाई का ये गम भी उठा मैं लेता,
जला अलख प्यार का गर दूर तू होती..

मनाने का हुनर भी सीख मैं लेता,
इक प्यार से गर मुझसे रूठ तू जाती..

सहज ही स्वतः ही तेरा मैं होता,
एक क्षण को भी गर मेरी तू होती...

-प्रदीप कुमार साहनी

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (09-01-2016) को "जब तलक है दम, कलम चलती रहेगी" (चर्चा अंक-2216) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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