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Wednesday, July 29, 2015

रिश्ते- "तब और अब"

 एक वो जमाना था कभी, आज ये एक जमाना है,
तब पास रहने की इच्छा थी, अब दूर रहने का बहाना है..

अपनो के नजदीक थे तब, अब रिश्ते बस निभाना है,
तब वक्त बिताना भाता था, अब देख नजर चुराना है..

खुशियाँ ही तब चाहत थी,अब काम-दाम पे निशाना है,
तब रिश्तों को चमकाना था, अब बस कैरियर को बनाना है..

अहम थे तब जज्बात सभी, अब बना बनाया ढहाना है,
मिल जुल कर तब रहना था, अब अपनी डफली बजाना है..

तब आँख बंद हो भरोसा था, अब हर बात पे आजमाना है,
कथनी तब कुछ और ही थी, अब करनी अलग दिखाना है..

काश जो था तब फिर अब भी हो, फिर वैसे सब कुछ सजाना है..
हर अपनों को फिर जोड़ना है, हर रुठे हुए को मनाना है.

7 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार 30 जुलाई 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 30-07-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2052 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  3. हर जड़ वस्तु का आनंद अस्थाई होता है असली आनंद प्रेमानंद (कृष्णा प्रेम )हैं ब्रह्मानंद हैं

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  4. वक्त बदलता है..वक्त के साथ सब बदलता है..

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  5. बहुत नेक ख़याल हैं आपके पर जरा मुश्किल लगते हैं वही आपकी भाषा में तब और अब

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